इंसान की भी नियत क्या डगमगाई है,
तारों की चमक चंद सिक्को में पाई है।
चढ़ाते थे जो फूल मकबरे पर सिर झुकाए,
आज उसी ने खुशबूओं की कीमत लगाई है।
वफ़ा के नाम पर कभी जान भी देते थे,
आज मोहब्बत के नाम पर बस बेवफाई है।
पराये भी आए तो खुदा से कम न समझा,
आज मेहमान-नवाजी में होती बस रुसवाई है।
मौखाटा ओढ़े छुपा रहे हैं खुदी से खुद को हम,
आइना देख कर भी क्यों हमें लाज न आई है?
जीने के लिए जीना है तो जी ज़िन्दगी ऐसे ही,
पर याद रख, मौत ही ज़िन्दगी की सचाई है।
Saturday, June 30, 2012
Saturday, June 23, 2012
हम है भीगे, हम है भीगे।
आज जो जम कर बरसी है बारिश,
हम है भीगे, हम है भीगे।
आज मौसम ने भी जलाई है आतिश,
हम है भीगे, हम है भीगे।
सर उठा कर जो ऊपर देखा मैंने, तो माथे की लकीरें धुल गयी।
नीला आसमान भी दिखा मुझे, जो बादलों की खिड़की खुल गयी।
क्या ये है, गीले बूंदों की साजिश?
हम है भीगे, हम है भीगे।
ऊँचे ऊँचे जो पर्वत थे, अब लगने लगे हैं मुझको वो बोने।
रंग बिरंगी है फूलवारी महकी, हरियाली छाई है कोने कोने।
ये किसके दुआ की है आज़मायिश?
हम है भीगे, हम है भीगे।
कुछ और पल जीने की जगी है आस, इस बेचेन मेरे दिल में।
मोहब्बत ही मोहब्बत है भिची, अरमानों की इस महफ़िल में।
खुदा ने जैसे जताई हो अपनी फरमाइश,
हम है भीगे, हम है भीगे।
अचानक ही दिल मेरा जैसे, रगों में हो खुशियाँ फेला रहा।
जन्नत हो ये मेरा जहाँ, और रूह को हो खुदा से मिला रहा।
इतने सुकून की तो कभी न थी ख्वाइश,
हम है भीगे, हम है भीगे।
हम है भीगे, हम है भीगे।
आज मौसम ने भी जलाई है आतिश,
हम है भीगे, हम है भीगे।
सर उठा कर जो ऊपर देखा मैंने, तो माथे की लकीरें धुल गयी।
नीला आसमान भी दिखा मुझे, जो बादलों की खिड़की खुल गयी।
क्या ये है, गीले बूंदों की साजिश?
हम है भीगे, हम है भीगे।
ऊँचे ऊँचे जो पर्वत थे, अब लगने लगे हैं मुझको वो बोने।
रंग बिरंगी है फूलवारी महकी, हरियाली छाई है कोने कोने।
ये किसके दुआ की है आज़मायिश?
हम है भीगे, हम है भीगे।
कुछ और पल जीने की जगी है आस, इस बेचेन मेरे दिल में।
मोहब्बत ही मोहब्बत है भिची, अरमानों की इस महफ़िल में।
खुदा ने जैसे जताई हो अपनी फरमाइश,
हम है भीगे, हम है भीगे।
अचानक ही दिल मेरा जैसे, रगों में हो खुशियाँ फेला रहा।
जन्नत हो ये मेरा जहाँ, और रूह को हो खुदा से मिला रहा।
इतने सुकून की तो कभी न थी ख्वाइश,
हम है भीगे, हम है भीगे।
Saturday, June 2, 2012
दो शहरों के बीच
सड़को पर दोड़ते पहियों को देखा हमने,
कुछ निगाहें हम पर भी पड़ी ज़रूर।
आए तो थे कुछ वक़्त के लिए ही यहाँ,
मगर वो वक़्त मानो ठहर सा गया है ।
यहाँ मौसम का मिज़ाज कुछ कम बदलता है ।
उतार चढ़ाव के दौर से थोड़ा कम गुज़रता है ।
गर्मी के थपेड़ो की तो कमी महसूस नहीं होती,
पर कड़कड़ाती ठण्ड में रजाई का मज़ा खलता है ।
और जब में अपने घर की खिड़की से बहार झांकता हूँ,
तो मुझे दो शहर नज़र आते हैं ।
एक वो ,
जहाँ बड़ी-बड़ी इमारतें, आसमान को छू जाती हैं।
जहाँ लम्बी-लम्बी गाड़ियां, सड़को पर दोड़ती नज़र आती है ।
जहाँ दौलत की नुमाइश, कम कपड़े पहनकर की जाती है ,
और जहाँ हर ख़ुशी, पैमानों को टकराकर मनाई जाती है ।
दूसरा वो है,
जहाँ चंद सिक्को के लिए, जिंदगियां दांव में लग जाती है ।
जहाँ दो वक़्त की रोटी जुटाने में, ज़िन्दगी गुज़र जाती है।
जहाँ नुमाइश, कम कपड़े पहनने की विवशता में आती है,
और जहाँ हर ख़ुशी, रात को चैन की नींद में मिल जाती है ।
मैं, लक्ष्य, इन दो शेहेरों के बीच में खुद को तलाशता हूँ ,
अपनी बेबसी का चोला ओढ़े, अपने दिल को बहलाता हूँ ।
बस तज़ार कर, इस वक़्त के गुज़र जाने का,
मौसम के बदलने का, गर्मी के पिघल जाने का।
इंतज़ार कर, ये दो शहरों के आपस में मिल जाने का,
शायद फिर, कड़कड़ाती ठण्ड में रजाई का मज़ा लौट आएगा।
कुछ निगाहें हम पर भी पड़ी ज़रूर।
आए तो थे कुछ वक़्त के लिए ही यहाँ,
मगर वो वक़्त मानो ठहर सा गया है ।
यहाँ मौसम का मिज़ाज कुछ कम बदलता है ।
उतार चढ़ाव के दौर से थोड़ा कम गुज़रता है ।
गर्मी के थपेड़ो की तो कमी महसूस नहीं होती,
पर कड़कड़ाती ठण्ड में रजाई का मज़ा खलता है ।
और जब में अपने घर की खिड़की से बहार झांकता हूँ,
तो मुझे दो शहर नज़र आते हैं ।
एक वो ,
जहाँ बड़ी-बड़ी इमारतें, आसमान को छू जाती हैं।
जहाँ लम्बी-लम्बी गाड़ियां, सड़को पर दोड़ती नज़र आती है ।
जहाँ दौलत की नुमाइश, कम कपड़े पहनकर की जाती है ,
और जहाँ हर ख़ुशी, पैमानों को टकराकर मनाई जाती है ।
दूसरा वो है,
जहाँ चंद सिक्को के लिए, जिंदगियां दांव में लग जाती है ।
जहाँ दो वक़्त की रोटी जुटाने में, ज़िन्दगी गुज़र जाती है।
जहाँ नुमाइश, कम कपड़े पहनने की विवशता में आती है,
और जहाँ हर ख़ुशी, रात को चैन की नींद में मिल जाती है ।
मैं, लक्ष्य, इन दो शेहेरों के बीच में खुद को तलाशता हूँ ,
अपनी बेबसी का चोला ओढ़े, अपने दिल को बहलाता हूँ ।
बस तज़ार कर, इस वक़्त के गुज़र जाने का,
मौसम के बदलने का, गर्मी के पिघल जाने का।
इंतज़ार कर, ये दो शहरों के आपस में मिल जाने का,
शायद फिर, कड़कड़ाती ठण्ड में रजाई का मज़ा लौट आएगा।
Saturday, May 12, 2012
माँ की रोटी
बस कुछ देर तुझसे दूर चला हूँ मैं,
माँ! आँखों में कुछ हसीं सपने भरा हूँ मैं।
पर देखो चाँद से चांदनी दूर जाने लगी है,
आसमां में काली बदलियाँ छाने लगी है।
नहीं आती नींद मखमली तकियों में अब मुझे,
तेरी गोदी में सर रख सो जाने को जी चाहता है।
मेरे केशों को जैसे किसी की लगी है नज़र,
तेरे हाथो से मालिश करवाने को जी चाहता है।
नहीं भाता है बड़े होटलों का अब खाना मुझे,
तेरे हाथों से बनी रोटी खाने को जी चाहता है।
नहीं जागना चाहता सुनकर घंटी की आवाज़ मैं ,
तेरी पुकार से अपनी सुबह करने को जी चाहता है ।
नहीं करता अब कोई इंतज़ार घर आने का मेरे
तुझे दरवाज़े पे राह ताके देखने को जी चाहता है।
बहुत कमाकर भी खाली ही हाथ है मेरे, माँ!
तेरे आँचल से कुछ सिक्के चुराने को जी चाहता है।
बहुत दूर तक निकल आया हूँ अकेले ही मैं,
तेरा हाथ पकड़ कुछ दूर चलने को जी चाहता है।
वादा नहीं करता कि तेरे आँखों में न आंसू लाऊँ,
मेरी मजबूरी में बस तेरी दुआओं को जी चाहता है।
माँ! आँखों में कुछ हसीं सपने भरा हूँ मैं।
पर देखो चाँद से चांदनी दूर जाने लगी है,
आसमां में काली बदलियाँ छाने लगी है।
नहीं आती नींद मखमली तकियों में अब मुझे,
तेरी गोदी में सर रख सो जाने को जी चाहता है।
मेरे केशों को जैसे किसी की लगी है नज़र,
तेरे हाथो से मालिश करवाने को जी चाहता है।
नहीं भाता है बड़े होटलों का अब खाना मुझे,
तेरे हाथों से बनी रोटी खाने को जी चाहता है।
नहीं जागना चाहता सुनकर घंटी की आवाज़ मैं ,
तेरी पुकार से अपनी सुबह करने को जी चाहता है ।
नहीं करता अब कोई इंतज़ार घर आने का मेरे
तुझे दरवाज़े पे राह ताके देखने को जी चाहता है।
बहुत कमाकर भी खाली ही हाथ है मेरे, माँ!
तेरे आँचल से कुछ सिक्के चुराने को जी चाहता है।
बहुत दूर तक निकल आया हूँ अकेले ही मैं,
तेरा हाथ पकड़ कुछ दूर चलने को जी चाहता है।
वादा नहीं करता कि तेरे आँखों में न आंसू लाऊँ,
मेरी मजबूरी में बस तेरी दुआओं को जी चाहता है।
शाएरी - 13/05/2012
ये हुसन के दरख्तों पे मुस्कानों के फूल खिले,
दूर खड़े अरमानों को बस मायूसी के शूल मिले।
ये हिजाब, ये दायरों में खिलती नाज़ुक-सी कली,
ये दुनिए लगे वीरानी जो मुझको तेरी जुस्तुजू मिले।
ये नुमाइश के हज़ार रंग, ये अदाओं की जादूगरी,
जो देखूं तुझे हरपल तो इस दिल को कैसे सुकून मिले?
मांगता हूँ खुदा से जो न मिले तू तो क्या मिले,
जीने कि चाह न सही पर मरने का जूनून मिले।
दूर खड़े अरमानों को बस मायूसी के शूल मिले।
ये हिजाब, ये दायरों में खिलती नाज़ुक-सी कली,
ये दुनिए लगे वीरानी जो मुझको तेरी जुस्तुजू मिले।
ये नुमाइश के हज़ार रंग, ये अदाओं की जादूगरी,
जो देखूं तुझे हरपल तो इस दिल को कैसे सुकून मिले?
मांगता हूँ खुदा से जो न मिले तू तो क्या मिले,
जीने कि चाह न सही पर मरने का जूनून मिले।
Tuesday, February 21, 2012
ग़ज़ल - 21/02/2012
मेरा दिल, मेरा ही रकीब हो गया।
अश्कों में जीना मेरा नसीब हो गया ।
यहाँ घन्हे बादलों का तो है मेला,
मगर दो बूँद ही मेरा हबीब हो गया।
देता है दिल मुझे दर्द के तोहफे,
अब तो ये दर्द ही मेरा हकीम हो गया।
जो दिखता है दरया में चाँद मुझे,
तेरा चेहरा मुझसे कितना करीब हो गया।
फूलों में भी कहाँ कुश्बू बची है,
तू गया तो भंवरा भी यतीम हो गया।
अश्कों में जीना मेरा नसीब हो गया ।
यहाँ घन्हे बादलों का तो है मेला,
मगर दो बूँद ही मेरा हबीब हो गया।
देता है दिल मुझे दर्द के तोहफे,
अब तो ये दर्द ही मेरा हकीम हो गया।
जो दिखता है दरया में चाँद मुझे,
तेरा चेहरा मुझसे कितना करीब हो गया।
फूलों में भी कहाँ कुश्बू बची है,
तू गया तो भंवरा भी यतीम हो गया।
Friday, February 10, 2012
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है ।
वो चौखट जिसे सूरज कि पहली किरण करती थी नमन,
वो हवाओं के थपेड़ो में खड़खड़ाती खिडकियों की कश्मकश,
वो खपरेलों की छत पर पड़ती बारिश कि बूंदों का संगीत,
वो सब बहुत याद आता है,
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है।
जिसकी छत की मुडेर पर कबूतरों का होता था अक्सर डेरा,
जिसके सामने वाले मकान को एक पीपल के पेड़ ने था घेरा,
जिसके पास गुज़रती गली में बच्चों के कह्कशो का था मेला,
वो सब मुझे वापस बुलाता है ,
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है ।
वो दीवारों पर गोदा-गादी बचपन की याद दिलाता था,
वो आँगन का खराब हैंडपंप उसपर झूलने पर उकसाता था,
वो रात में छत से आसमान का नज़ारा, अलग मज़ा आता था,
क्यों याद आकर अब मुझे रुलाता है?
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है।
कोई नहीं रहता उसमें अब, वीरान पड़ा हुआ है वो,
ताक रहा है राह मेरी, फिर जीवित होने की आस में वो,
दीवारों पर रंगों की परते अब ज़रूर गिरने लगी है,
कोई नहीं उसपर अब रंग करवाता है,
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है।
कौन कहता है कि निर्जीव से रिश्ता नहीं जुड़ पाता है,
यहाँ तो पत्थर कि मूरत से भी अटूट बंधन बन जाता है,
जीवन के उधेड़-बुंद में हम ज़रूर उनको भूला देते हैं,
पर एक वो हैं, जो हमें कभी न भुला पाता है ,
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है।
वो चौखट जिसे सूरज कि पहली किरण करती थी नमन,
वो हवाओं के थपेड़ो में खड़खड़ाती खिडकियों की कश्मकश,
वो खपरेलों की छत पर पड़ती बारिश कि बूंदों का संगीत,
वो सब बहुत याद आता है,
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है।
जिसकी छत की मुडेर पर कबूतरों का होता था अक्सर डेरा,
जिसके सामने वाले मकान को एक पीपल के पेड़ ने था घेरा,
जिसके पास गुज़रती गली में बच्चों के कह्कशो का था मेला,
वो सब मुझे वापस बुलाता है ,
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है ।
वो दीवारों पर गोदा-गादी बचपन की याद दिलाता था,
वो आँगन का खराब हैंडपंप उसपर झूलने पर उकसाता था,
वो रात में छत से आसमान का नज़ारा, अलग मज़ा आता था,
क्यों याद आकर अब मुझे रुलाता है?
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है।
कोई नहीं रहता उसमें अब, वीरान पड़ा हुआ है वो,
ताक रहा है राह मेरी, फिर जीवित होने की आस में वो,
दीवारों पर रंगों की परते अब ज़रूर गिरने लगी है,
कोई नहीं उसपर अब रंग करवाता है,
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है।
कौन कहता है कि निर्जीव से रिश्ता नहीं जुड़ पाता है,
यहाँ तो पत्थर कि मूरत से भी अटूट बंधन बन जाता है,
जीवन के उधेड़-बुंद में हम ज़रूर उनको भूला देते हैं,
पर एक वो हैं, जो हमें कभी न भुला पाता है ,
फिर वो पुराने घर लौट जाने को जी चाहता है।
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