एक चोर था मेरे मन में,
एक चोर था तेरे मन में ।
कुछ थी न तुझको खबर,
कुछ मैं भी था बेखबर ।
पर एहसास था कहीं छुपा हुआ है ।
और दिखावों के बोझों में दबा हुआ है ।
वो आदत के जालों में घिरा हुआ है ।
वो मजबूरी के धागों में फिर हुआ है ।
कोई देता था दस्तक तो कई बार ,
पर सुनकर अनसुना करा हर बार ।
पर बहुत देर से एक आंधी आई है
जो खटखटा रही है दरवाज़ा कई बार।
लगता है अब न रुक पायेगा ये दरवाज़ा।
लगता है जल्द टूट जायेगा ये दरवाज़ा ।
कुछ तो होगा जो झिंझोड़ेगा मुझे,
कुछ तो होगी हलचल भी तुझे ।
फिर लगेगी सीने में जो आग ,
फिर जा निकालेंगे वो चोर भाग ।
फिर तू भी चैन से सो सकता है ।
फिर में भी चैन से सो सकता हूँ ।
Thursday, August 25, 2011
Thursday, August 11, 2011
वो आदत थी तुम्हारी ..
वो आदत थी तुम्हारी सनम जो तुम हमें रुसवा किया करे,
ये आदत है हमारी सनम जो हम तुमसे रुसवा हुआ करे।
वो नूर था तुम्हारा जिसे देख हम सदा जिया करे,
ये अश्क है हमारे जिनको तुमने सदा अनदेखा करे।
वो ग़ज़ल थी लब्ज़ो में तुम्हारी जो हम सदा सुना करे,
ये गम हैं हमारे जो तुम्हारे कानों तक न पहुंचा करे ।
वो लहरें थी तुम्हारे केशों की लटे जिसमें हम डूबा करे,
ये सेलाब है हमारे प्यार का जो छुहे बिना तुमसे गुजरा करे।
वो गुज़रे पल थे तुम्हारे जिनकी यादें हमारी दुनिया बना करे,
ये ज़िन्दगी है हमारी जो तेरे सागर में बस बुलबुले बना करे।
वो शिकवे थे तुम्हारे जो हमारी ज़िन्दगी के दस्तूर हुआ करे,
ये दर्द है हमारे जो तुम्हारी ज़िन्दगी से बहुत दूर हुआ करे।
वो रूह थी तुम्हारी जिसे छुने की आस में हम दर-बदर भटका करे,
ये दिल्लगी है हमारी जिस से बचकर तुम मुस्कराएं चला करे।
वो वादे थे तुम्हारे जिसे हमने खुदा का हुकुम समझा किया करे,
ये खुदा है हमारा जिसे तुमने बुद समझ कर ठुकरा दिया करे।
वो टूटी पायल थी तुम्हारी जिसे हमने हमेशा महफूज़ रखा करे,
ये दौलत है हमारी जिसको लुटते हमने सरे-आम देखा करे।
वो लबों की हंसी तुम्हारी जो साया बन संग मेरे घुमा करे,
ये ख़ुशी है हमारी जो तेरे साये में अपना साया ढूँढा करे।
वो मर्ज़ी थी तुम्हारी जो तुमने हमसे दूर जाना तय किया करे,
ये मर्ज़ी है हमारी की हमने तुम्हारा इंतज़ार करना तय किया करे।
ये आदत है हमारी सनम जो हम तुमसे रुसवा हुआ करे।
वो नूर था तुम्हारा जिसे देख हम सदा जिया करे,
ये अश्क है हमारे जिनको तुमने सदा अनदेखा करे।
वो ग़ज़ल थी लब्ज़ो में तुम्हारी जो हम सदा सुना करे,
ये गम हैं हमारे जो तुम्हारे कानों तक न पहुंचा करे ।
वो लहरें थी तुम्हारे केशों की लटे जिसमें हम डूबा करे,
ये सेलाब है हमारे प्यार का जो छुहे बिना तुमसे गुजरा करे।
वो गुज़रे पल थे तुम्हारे जिनकी यादें हमारी दुनिया बना करे,
ये ज़िन्दगी है हमारी जो तेरे सागर में बस बुलबुले बना करे।
वो शिकवे थे तुम्हारे जो हमारी ज़िन्दगी के दस्तूर हुआ करे,
ये दर्द है हमारे जो तुम्हारी ज़िन्दगी से बहुत दूर हुआ करे।
वो रूह थी तुम्हारी जिसे छुने की आस में हम दर-बदर भटका करे,
ये दिल्लगी है हमारी जिस से बचकर तुम मुस्कराएं चला करे।
वो वादे थे तुम्हारे जिसे हमने खुदा का हुकुम समझा किया करे,
ये खुदा है हमारा जिसे तुमने बुद समझ कर ठुकरा दिया करे।
वो टूटी पायल थी तुम्हारी जिसे हमने हमेशा महफूज़ रखा करे,
ये दौलत है हमारी जिसको लुटते हमने सरे-आम देखा करे।
वो लबों की हंसी तुम्हारी जो साया बन संग मेरे घुमा करे,
ये ख़ुशी है हमारी जो तेरे साये में अपना साया ढूँढा करे।
वो मर्ज़ी थी तुम्हारी जो तुमने हमसे दूर जाना तय किया करे,
ये मर्ज़ी है हमारी की हमने तुम्हारा इंतज़ार करना तय किया करे।
Wednesday, August 3, 2011
मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है
आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है ,
किसे कहें हम अपना हर एक अंजाना सा लगता है।
सुकड़न पड़ी दीवारें अब बस कड़ाड़ती ही हैं,
ज़मीन पर पड़ी सलवटें अब सुलझती नहीं ।
दरख्तों के दरवाजों पर जंग जो लगी है,
खिड़किओं से वो सुबह की रौशनी गुज़रती नहीं।
अब घर जाने का जो वक़्त बहाना सा लगता है
आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है
अब कोई आइना भी नहीं जिसे हम दोस्त कह सकते,
चुभते टूटे कांच के टुकड़े का एहसास अभी भी है ।
अब तो लहू भी नहीं छोड़ता निशाँ अपने ज़मीन पर,
जो बन चूका ज़मीन आदम तो इसकी प्यास अभी भी है।
दूर जाना भी अब इससे गुस्ताक-नामा सा लगता है,
आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है।
मेरा घर मुझसे कहता की में काफिर हूँ उसका
जो रखता नहीं ख्याल उसका मैं पल भर भी।
वो आए तो थे सौदा करने मेरा मकान का,
मेरी इनकार के साथ चल दिया मेरा घर भी।
बचा हुआ मेरा मकान अब विराना सा लगता है,
आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है।
किसे कहें हम अपना हर एक अंजाना सा लगता है।
सुकड़न पड़ी दीवारें अब बस कड़ाड़ती ही हैं,
ज़मीन पर पड़ी सलवटें अब सुलझती नहीं ।
दरख्तों के दरवाजों पर जंग जो लगी है,
खिड़किओं से वो सुबह की रौशनी गुज़रती नहीं।
अब घर जाने का जो वक़्त बहाना सा लगता है
आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है
अब कोई आइना भी नहीं जिसे हम दोस्त कह सकते,
चुभते टूटे कांच के टुकड़े का एहसास अभी भी है ।
अब तो लहू भी नहीं छोड़ता निशाँ अपने ज़मीन पर,
जो बन चूका ज़मीन आदम तो इसकी प्यास अभी भी है।
दूर जाना भी अब इससे गुस्ताक-नामा सा लगता है,
आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है।
मेरा घर मुझसे कहता की में काफिर हूँ उसका
जो रखता नहीं ख्याल उसका मैं पल भर भी।
वो आए तो थे सौदा करने मेरा मकान का,
मेरी इनकार के साथ चल दिया मेरा घर भी।
बचा हुआ मेरा मकान अब विराना सा लगता है,
आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है।
Thursday, July 21, 2011
शायरी - 2107
सोचा इश्क के बाज़ार में दिल का सौदा करने जाए,
पर कम्भक्त दिल के बदले हम गम खरीद लाए
और ये गम की तासीर की हिमाक़त थी जो
फिर गए थे गम बेचने तो हम खुद को ही बेच आए
अब क्या खरीदें, अब क्या बेचें, अब तो न कुछ भाए।
पर कम्भक्त दिल के बदले हम गम खरीद लाए
और ये गम की तासीर की हिमाक़त थी जो
फिर गए थे गम बेचने तो हम खुद को ही बेच आए
अब क्या खरीदें, अब क्या बेचें, अब तो न कुछ भाए।
मेरे कमरे की तस्वीर
कई बरस पहले मेरे कमरे में एक तस्वीर टंगा करती थी।
दुनिया के दस्तूरों से बचकर अक्सर मुझसे बातें किया करती थी।
कहानी, किस्से, सवालों की सौगातें लाती थी,
मुझे मेरी तनहाइयों से आज़ाद करवाती थी।
कभी मुझे मनाती, तो कभी मुझे सताती थी,
मेरे संग झूमती, मेरे संग खुशियाँ मनाती थी।
जाने क्यों मैं एक दिन वो कमरा छोड़कर चला गया,
अपनी वो तस्वीर को अकेला छोड़कर चला गया।
अब आया हूँ वापस तो मेरे कमरे में वो तस्वीर नहीं है,
भिकरी हुई ज़िन्दगी में मानो मेरी कोई तकदीर नहीं है।
वो कौन-सी हवा का झोंका था जिसने वो तस्वीर गिरा दिया,
या बाबू जी ने चंद पैसों के खातिर रद्दी में फिकवा दिया।
अभी भी दिवार पर हलके-हलके कुछ उसके निशाँ बाकी है,
छूता हूँ ज़मीन को तो कुछ चुभते कांच के टुकड़े बाकी है।
कई बरस बाद भी तकती है निगाह मेरी उस दिवार पर,
बस! लौटा दो मुझे वो तस्वीर, अबके बरस की पोहार पर।
दुनिया के दस्तूरों से बचकर अक्सर मुझसे बातें किया करती थी।
कहानी, किस्से, सवालों की सौगातें लाती थी,
मुझे मेरी तनहाइयों से आज़ाद करवाती थी।
कभी मुझे मनाती, तो कभी मुझे सताती थी,
मेरे संग झूमती, मेरे संग खुशियाँ मनाती थी।
जाने क्यों मैं एक दिन वो कमरा छोड़कर चला गया,
अपनी वो तस्वीर को अकेला छोड़कर चला गया।
अब आया हूँ वापस तो मेरे कमरे में वो तस्वीर नहीं है,
भिकरी हुई ज़िन्दगी में मानो मेरी कोई तकदीर नहीं है।
वो कौन-सी हवा का झोंका था जिसने वो तस्वीर गिरा दिया,
या बाबू जी ने चंद पैसों के खातिर रद्दी में फिकवा दिया।
अभी भी दिवार पर हलके-हलके कुछ उसके निशाँ बाकी है,
छूता हूँ ज़मीन को तो कुछ चुभते कांच के टुकड़े बाकी है।
कई बरस बाद भी तकती है निगाह मेरी उस दिवार पर,
बस! लौटा दो मुझे वो तस्वीर, अबके बरस की पोहार पर।
ग़ज़ल - 2107
पीते हैं हम तो पीने का गम नहीं है,
जिसका है गम वो मेरे संग नहीं है।
गुज़रे जो शाम मयकदे में हमेशा,
रात का जगना तो मरने से कम नहीं है।
पीते हैं रोज़ ज़हर सोचकर कि उठ न पाए कभी,
पर लगता है अब शराब में भी वो दम नहीं है।
अब दरकिनार कर चुके हैं दुनियावालों ने हमें,
इस बुद्परस्त दुनिया में संगदिल कम नहीं है।
इस आफताब की गहराही में, चाँद की परछाई में,
बहुत ढूँढा हमने मगर कहीं मेरा सनम नहीं है।
उठती थी कभी नज़रें देखने तेरे ही शादाब को,
अब धुंधली हैं नज़र, अश्को से आँखे नम नहीं है।
खुद रुसवा हुए पर तेरी बेवफाई को मुश्तहिर न किया,
पर अब तेरी बेवफाई में, तेरे संग हम नहीं है।
पीते हैं हम तो पीने का गम नहीं है।
जिसका है गम वो मेरे संग नहीं है।
गुज़रे जो शाम मयकदे में हमेशा,
रात का जगना तो मरने से कम नहीं है।
पीते हैं रोज़ ज़हर सोचकर कि उठ न पाए कभी,
पर लगता है अब शराब में भी वो दम नहीं है।
अब दरकिनार कर चुके हैं दुनियावालों ने हमें,
इस बुद्परस्त दुनिया में संगदिल कम नहीं है।
इस आफताब की गहराही में, चाँद की परछाई में,
बहुत ढूँढा हमने मगर कहीं मेरा सनम नहीं है।
उठती थी कभी नज़रें देखने तेरे ही शादाब को,
अब धुंधली हैं नज़र, अश्को से आँखे नम नहीं है।
खुद रुसवा हुए पर तेरी बेवफाई को मुश्तहिर न किया,
पर अब तेरी बेवफाई में, तेरे संग हम नहीं है।
पीते हैं हम तो पीने का गम नहीं है।
Sunday, June 26, 2011
खुद को भूले
गम के अंधेरों में कभी हम खुद से भी बातें कर लिया करते थे,
जब से चांदनी ने घेरा है हमें, मानो खुद को ही भूल गये हैं।
अब बातों का वो जलसा नहीं सजता है
और मदिरा का पैमाना नहीं छलकता है,
वो तेरे नैनों की ग़ज़ल में ऐसे डूबे हैं
मानो खुद शायरी ही भूल गये हैं।
ये गुजरने वाली हवा का वो झोका है,
जो गुजरने के बाद भी अपनी महक छोड़ जाएगी।
और ये महक ही है जो डराती हमें,
मानो खुद सांस लेना ही भूल गये हैं।
अब धुप से ढकी दीवारों पर सीलन नहीं पड़ा करती है,
और छत पर कबूतरों का जमावड़ा भी चला आता है,
और जताते हैं की दाना डाला करते थे हम कभी,
पर अब मानो खुद खाना ही भूल गये हैं।
एक दिन ये उड़ जायेंगे अपने पंख पखारे,
और हम देखते रह जायेंगे टूटे सपने सारे।
घनघोर बादलों के बीच छिप जाएगी धुप सारी,
फिर होगा अंधेरों का दामन और होगी ग़मों की चादर,
फिर से चलेगा दौर बातों का और तब आयेंगे याद खुद को हम।
जब से चांदनी ने घेरा है हमें, मानो खुद को ही भूल गये हैं।
अब बातों का वो जलसा नहीं सजता है
और मदिरा का पैमाना नहीं छलकता है,
वो तेरे नैनों की ग़ज़ल में ऐसे डूबे हैं
मानो खुद शायरी ही भूल गये हैं।
ये गुजरने वाली हवा का वो झोका है,
जो गुजरने के बाद भी अपनी महक छोड़ जाएगी।
और ये महक ही है जो डराती हमें,
मानो खुद सांस लेना ही भूल गये हैं।
अब धुप से ढकी दीवारों पर सीलन नहीं पड़ा करती है,
और छत पर कबूतरों का जमावड़ा भी चला आता है,
और जताते हैं की दाना डाला करते थे हम कभी,
पर अब मानो खुद खाना ही भूल गये हैं।
एक दिन ये उड़ जायेंगे अपने पंख पखारे,
और हम देखते रह जायेंगे टूटे सपने सारे।
घनघोर बादलों के बीच छिप जाएगी धुप सारी,
फिर होगा अंधेरों का दामन और होगी ग़मों की चादर,
फिर से चलेगा दौर बातों का और तब आयेंगे याद खुद को हम।
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