Wednesday, August 3, 2011

मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है

आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है ,
किसे कहें हम अपना हर एक अंजाना सा लगता है।

सुकड़न पड़ी दीवारें अब बस कड़ाड़ती ही हैं,
ज़मीन पर पड़ी सलवटें अब सुलझती नहीं ।
दरख्तों के दरवाजों पर जंग जो लगी है,
खिड़किओं से वो सुबह की रौशनी गुज़रती नहीं।

अब घर जाने का जो वक़्त बहाना सा लगता है
आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है

अब कोई आइना भी नहीं जिसे हम दोस्त कह सकते,
चुभते टूटे कांच के टुकड़े का एहसास अभी भी है ।
अब तो लहू भी नहीं छोड़ता निशाँ अपने ज़मीन पर,
जो बन चूका ज़मीन आदम तो इसकी प्यास अभी भी है।

दूर जाना भी अब इससे गुस्ताक-नामा सा लगता है,
आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है।

मेरा घर मुझसे कहता की में काफिर हूँ उसका
जो रखता नहीं ख्याल उसका मैं पल भर भी।
वो आए तो थे सौदा करने मेरा मकान का,
मेरी इनकार के साथ चल दिया मेरा घर भी।

बचा हुआ मेरा मकान अब विराना सा लगता है,
आज कल मेरा घर मुझे बेगाना सा लगता है।

Thursday, July 21, 2011

शायरी - 2107

सोचा इश्क के बाज़ार में दिल का सौदा करने जाए,
पर कम्भक्त दिल के बदले हम गम खरीद लाए
और ये गम की तासीर की हिमाक़त थी जो
फिर गए थे गम बेचने तो हम खुद को ही बेच आए

अब क्या खरीदें, अब क्या बेचें, अब तो न कुछ भाए।

मेरे कमरे की तस्वीर

कई बरस पहले मेरे कमरे में एक तस्वीर टंगा करती थी।
दुनिया के दस्तूरों से बचकर अक्सर मुझसे बातें किया करती थी।

कहानी, किस्से, सवालों की सौगातें लाती थी,
मुझे मेरी तनहाइयों से आज़ाद करवाती थी।

कभी मुझे मनाती, तो कभी मुझे सताती थी,
मेरे संग झूमती, मेरे संग खुशियाँ मनाती थी।

जाने क्यों मैं एक दिन वो कमरा छोड़कर चला गया,
अपनी वो तस्वीर को अकेला छोड़कर चला गया।

अब आया हूँ वापस तो मेरे कमरे में वो तस्वीर नहीं है,
भिकरी हुई ज़िन्दगी में मानो मेरी कोई तकदीर नहीं है।

वो कौन-सी हवा का झोंका था जिसने वो तस्वीर गिरा दिया,
या बाबू जी ने चंद पैसों के खातिर रद्दी में फिकवा दिया।

अभी भी दिवार पर हलके-हलके कुछ उसके निशाँ बाकी है,
छूता हूँ ज़मीन को तो कुछ चुभते कांच के टुकड़े बाकी है।

कई बरस बाद भी तकती है निगाह मेरी उस दिवार पर,
बस! लौटा दो मुझे वो तस्वीर, अबके बरस की पोहार पर।

ग़ज़ल - 2107

पीते हैं हम तो पीने का गम नहीं है,
जिसका है गम वो मेरे संग नहीं है।
गुज़रे जो शाम मयकदे में हमेशा,
रात का जगना तो मरने से कम नहीं है।

पीते हैं रोज़ ज़हर सोचकर कि उठ न पाए कभी,
पर लगता है अब शराब में भी वो दम नहीं है।

अब दरकिनार कर चुके हैं दुनियावालों ने हमें,
इस बुद्परस्त दुनिया में संगदिल कम नहीं है।

इस आफताब की गहराही में, चाँद की परछाई में,
बहुत ढूँढा हमने मगर कहीं मेरा सनम नहीं है।

उठती थी कभी नज़रें देखने तेरे ही शादाब को,
अब धुंधली हैं नज़र, अश्को से आँखे नम नहीं है।

खुद रुसवा हुए पर तेरी बेवफाई को मुश्तहिर न किया,
पर अब तेरी बेवफाई में, तेरे संग हम नहीं है।

पीते हैं हम तो पीने का गम नहीं है।

Sunday, June 26, 2011

खुद को भूले

गम के अंधेरों में कभी हम खुद से भी बातें कर लिया करते थे,
जब से चांदनी ने घेरा है हमें, मानो खुद को ही भूल गये हैं।

अब बातों का वो जलसा नहीं सजता है
और मदिरा का पैमाना नहीं छलकता है,
वो तेरे नैनों की ग़ज़ल में ऐसे डूबे हैं
मानो खुद शायरी ही भूल गये हैं।

ये गुजरने वाली हवा का वो झोका है,
जो गुजरने के बाद भी अपनी महक छोड़ जाएगी।
और ये महक ही है जो डराती हमें,
मानो खुद सांस लेना ही भूल गये हैं।

अब धुप से ढकी दीवारों पर सीलन नहीं पड़ा करती है,
और छत पर कबूतरों का जमावड़ा भी चला आता है,
और जताते हैं की दाना डाला करते थे हम कभी,
पर अब मानो खुद खाना ही भूल गये हैं।

एक दिन ये उड़ जायेंगे अपने पंख पखारे,
और हम देखते रह जायेंगे टूटे सपने सारे।
घनघोर बादलों के बीच छिप जाएगी धुप सारी,
फिर होगा अंधेरों का दामन और होगी ग़मों की चादर,
फिर से चलेगा दौर बातों का और तब आयेंगे याद खुद को हम।

Friday, June 3, 2011

शायरी - 1204

तेरी जुस्तुजू तो नहीं, तेरा न कोई ख्वाब है,
बस गम की दुआओं का मेरे सर पर हाथ है।
जो अश्क नहीं बहे, उम्र भर मेरे मालिक,
अब गिरे जो दम-ब-दम तो तेरी सौगात है।

Thursday, June 2, 2011

मेरी आज़ादी

वो गुज़रा हुआ वक्त को देखा तो लगा कुछ बदल गया है,
जैसे यादों के पानी में बिखरे बर्फ की तरह पिघल गया है।
अब जब बुलबुले उठाते हैं, तो आँखों से दो आंसू छलक जाते हैं,
संभाले न संभालते हैं, जैसे पैमाने के मायेने बदल जाते हैं।

गम तो मुझे अभी भी नहीं है, पर वो क्या खुशियाँ का दौर था,
जब हंसी के फुहार से मिलते थे यार दोस्त वो ज़माना कुछ और था।
अब मगर लगता है जैसे सांसो ने जीना छोड़ दिया है,
अब खिलखलाते रास्तों ने इधर से गुज़रना छोड़ दिया है।

कभी खुली वादियों में पंख पखारे उड़ा करते थे,
कभी धरा को बिस्तर बनायें आसमान को ओड़ा करते थे।
अब वो चेतना खो गयी है, अब वो वादियाँ सो गयी है,
अब पक्की दीवारों का झुण्ड बचा है, और काले बादलों का घेरा है।

कभी डर की सीमाएं छोट्टी हुआ करती थी, कुछ ऊट-पटांग करने को दिल चाहता था,
कभी बाबूजी के कंधो पर बेठे हुए, सबसे ऊँचे होने का गुमान उमड़ आता था
अब सटीकता से दिल घबराता है, अपनी ही गलतियों के आईने में घिर जाता है,
अब खुद के भी कंधे मानो टूट गये हैं, जाने क्यों अब बाबूजी भी मुझसे रूठ गये हैं।

कभी अरमानों की अटकलों से निकलता था मेरा उज्जवल सवेरा,
कभी शाम को माँ के आँचल में गुजरता था मेरा सपनो का अँधेरा।
अब सपने भी देते नहीं दस्तक और सवेरा भी आने को नाराजी है,
अब जो आंचल उड़ा ले गयी है हवा कहता इसे मैं मेरी आजादी है।