तेरी जुस्तुजू तो नहीं, तेरा न कोई ख्वाब है,
बस गम की दुआओं का मेरे सर पर हाथ है।
जो अश्क नहीं बहे, उम्र भर मेरे मालिक,
अब गिरे जो दम-ब-दम तो तेरी सौगात है।
Friday, June 3, 2011
Thursday, June 2, 2011
मेरी आज़ादी
वो गुज़रा हुआ वक्त को देखा तो लगा कुछ बदल गया है,
जैसे यादों के पानी में बिखरे बर्फ की तरह पिघल गया है।
अब जब बुलबुले उठाते हैं, तो आँखों से दो आंसू छलक जाते हैं,
संभाले न संभालते हैं, जैसे पैमाने के मायेने बदल जाते हैं।
गम तो मुझे अभी भी नहीं है, पर वो क्या खुशियाँ का दौर था,
जब हंसी के फुहार से मिलते थे यार दोस्त वो ज़माना कुछ और था।
अब मगर लगता है जैसे सांसो ने जीना छोड़ दिया है,
अब खिलखलाते रास्तों ने इधर से गुज़रना छोड़ दिया है।
कभी खुली वादियों में पंख पखारे उड़ा करते थे,
कभी धरा को बिस्तर बनायें आसमान को ओड़ा करते थे।
अब वो चेतना खो गयी है, अब वो वादियाँ सो गयी है,
अब पक्की दीवारों का झुण्ड बचा है, और काले बादलों का घेरा है।
कभी डर की सीमाएं छोट्टी हुआ करती थी, कुछ ऊट-पटांग करने को दिल चाहता था,
कभी बाबूजी के कंधो पर बेठे हुए, सबसे ऊँचे होने का गुमान उमड़ आता था
अब सटीकता से दिल घबराता है, अपनी ही गलतियों के आईने में घिर जाता है,
अब खुद के भी कंधे मानो टूट गये हैं, जाने क्यों अब बाबूजी भी मुझसे रूठ गये हैं।
कभी अरमानों की अटकलों से निकलता था मेरा उज्जवल सवेरा,
कभी शाम को माँ के आँचल में गुजरता था मेरा सपनो का अँधेरा।
अब सपने भी देते नहीं दस्तक और सवेरा भी आने को नाराजी है,
अब जो आंचल उड़ा ले गयी है हवा कहता इसे मैं मेरी आजादी है।
जैसे यादों के पानी में बिखरे बर्फ की तरह पिघल गया है।
अब जब बुलबुले उठाते हैं, तो आँखों से दो आंसू छलक जाते हैं,
संभाले न संभालते हैं, जैसे पैमाने के मायेने बदल जाते हैं।
गम तो मुझे अभी भी नहीं है, पर वो क्या खुशियाँ का दौर था,
जब हंसी के फुहार से मिलते थे यार दोस्त वो ज़माना कुछ और था।
अब मगर लगता है जैसे सांसो ने जीना छोड़ दिया है,
अब खिलखलाते रास्तों ने इधर से गुज़रना छोड़ दिया है।
कभी खुली वादियों में पंख पखारे उड़ा करते थे,
कभी धरा को बिस्तर बनायें आसमान को ओड़ा करते थे।
अब वो चेतना खो गयी है, अब वो वादियाँ सो गयी है,
अब पक्की दीवारों का झुण्ड बचा है, और काले बादलों का घेरा है।
कभी डर की सीमाएं छोट्टी हुआ करती थी, कुछ ऊट-पटांग करने को दिल चाहता था,
कभी बाबूजी के कंधो पर बेठे हुए, सबसे ऊँचे होने का गुमान उमड़ आता था
अब सटीकता से दिल घबराता है, अपनी ही गलतियों के आईने में घिर जाता है,
अब खुद के भी कंधे मानो टूट गये हैं, जाने क्यों अब बाबूजी भी मुझसे रूठ गये हैं।
कभी अरमानों की अटकलों से निकलता था मेरा उज्जवल सवेरा,
कभी शाम को माँ के आँचल में गुजरता था मेरा सपनो का अँधेरा।
अब सपने भी देते नहीं दस्तक और सवेरा भी आने को नाराजी है,
अब जो आंचल उड़ा ले गयी है हवा कहता इसे मैं मेरी आजादी है।
Tuesday, May 3, 2011
One of my favourite lines with explaination
देखता हूँ की मैं क्या सोचूँ, सोचता हूँ की मैं क्या देखूं,
देखने से पहले ही जाने क्यों सोच बदल जाती है।
सोच की गहराई में खोज की गुंजाईश हो क्योंकि,
देखते ही देखते जाने क्यों खोज बदल जाती है।
Explaination:
This verse depicts the conflict between expectation (soch) and deserve (dekh).
We always have expectations and think that our expectation is what we deserve (First line)
but when we get something, we automatically raises our expectation, as in we are never dissatisfied with what we get.(second line)
We should not be disappointed with what we have or what we deserve and there has to be option of acceptance (third line)
because you never know when fate changes (fourth line)
देखने से पहले ही जाने क्यों सोच बदल जाती है।
सोच की गहराई में खोज की गुंजाईश हो क्योंकि,
देखते ही देखते जाने क्यों खोज बदल जाती है।
Explaination:
This verse depicts the conflict between expectation (soch) and deserve (dekh).
We always have expectations and think that our expectation is what we deserve (First line)
but when we get something, we automatically raises our expectation, as in we are never dissatisfied with what we get.(second line)
We should not be disappointed with what we have or what we deserve and there has to be option of acceptance (third line)
because you never know when fate changes (fourth line)
Randoms..
इश्क की भरी महफ़िल में हम भी रुसवा हुए हैं,
जिसे चाहते थे बे-इन्तहा वो भी देखो बेवफा हुए हैं।
किस्से और कहानियों जो सुना-पढ़ा करते थे हम,
आज देखो उन्ही पन्नो के हज़ार टुकड़े हवा हुए हैं।
सोचकर जो चले थे रस्ते पर वो फ़साना बदल गया है,
कई सदियों के बदलने में ये ज़माना बदल गया है।
तन्हाई में जो छोड़कर चले गये हैं जाने क्या बात है,
बदलते ज़माने में ये न सोचना की ये दीवाना बदल गया है।
वो गुज़रे तो थे उस रास्ते पर जिस रास्ते पर मैं खड़ा था,
न देखा एक बार मुड़कर उसने, सनम संगदिल बड़ा था।
उनके एक दीदार के खातिर मैंने बार बार खुद को मारा,
मगर वो आये नहीं ज़ालिम, कबसे मेरा जनाजः वहीँ पड़ा था।
तेरे कसबे बना सकूं, वो दरख़्त ढूंढता हूँ मैं,
जो गुज़रे तेरे संग, वो वक़्त ढूँढता हूँ मैं।
काश कोई पैमाना होता, जिस में होती इतनी शराब,
न रहते होश में हम, न लगती ये दुनिया खराब ।
जिसे चाहते थे बे-इन्तहा वो भी देखो बेवफा हुए हैं।
किस्से और कहानियों जो सुना-पढ़ा करते थे हम,
आज देखो उन्ही पन्नो के हज़ार टुकड़े हवा हुए हैं।
सोचकर जो चले थे रस्ते पर वो फ़साना बदल गया है,
कई सदियों के बदलने में ये ज़माना बदल गया है।
तन्हाई में जो छोड़कर चले गये हैं जाने क्या बात है,
बदलते ज़माने में ये न सोचना की ये दीवाना बदल गया है।
वो गुज़रे तो थे उस रास्ते पर जिस रास्ते पर मैं खड़ा था,
न देखा एक बार मुड़कर उसने, सनम संगदिल बड़ा था।
उनके एक दीदार के खातिर मैंने बार बार खुद को मारा,
मगर वो आये नहीं ज़ालिम, कबसे मेरा जनाजः वहीँ पड़ा था।
तेरे कसबे बना सकूं, वो दरख़्त ढूंढता हूँ मैं,
जो गुज़रे तेरे संग, वो वक़्त ढूँढता हूँ मैं।
काश कोई पैमाना होता, जिस में होती इतनी शराब,
न रहते होश में हम, न लगती ये दुनिया खराब ।
क्या मिला क्या न मिला
कुछ होते हैं बदनसीब जिनेह क़िनारा न मिला,
मुझे साहिल तो मिला पर कोई सहारा न मिला।
वो सजी तो थी महफ़िल कई चाँद से मगर,
ढूँढा किये जिसे हम रात भर वो हमारा न मिला।
तख़्त पर बेठे हुए देखा किया सारा जहाँ,
ग़मों की रौशनी में खुशिओं का नज़ारा न मिला।
याद है वो ठिकाना जहाँ मिले थे हम पहली बार,
अभी भी राह तख्ते हैं मगर वो मौका दुबारा न मिला।
क्या बिसात मेरी जो उठाऊँ सर तेरे आगे,
वो कयामत का दिन था पर शरारह न मिला।
वो कहते हैं की हम काफ़िर है तो पूछते है,
मेरे जनाजः पर क्यों दीदार तुम्हारा न मिला।
बड़ा तड़पे हैं तुझे अपना बनाने की चाहत में,
यादों की तनाहिओं में अब गुज़ारा न मिला।
मुझे साहिल तो मिला पर कोई सहारा न मिला।
वो सजी तो थी महफ़िल कई चाँद से मगर,
ढूँढा किये जिसे हम रात भर वो हमारा न मिला।
तख़्त पर बेठे हुए देखा किया सारा जहाँ,
ग़मों की रौशनी में खुशिओं का नज़ारा न मिला।
याद है वो ठिकाना जहाँ मिले थे हम पहली बार,
अभी भी राह तख्ते हैं मगर वो मौका दुबारा न मिला।
क्या बिसात मेरी जो उठाऊँ सर तेरे आगे,
वो कयामत का दिन था पर शरारह न मिला।
वो कहते हैं की हम काफ़िर है तो पूछते है,
मेरे जनाजः पर क्यों दीदार तुम्हारा न मिला।
बड़ा तड़पे हैं तुझे अपना बनाने की चाहत में,
यादों की तनाहिओं में अब गुज़ारा न मिला।
Thursday, September 23, 2010
क्या देखूं मैं ?
क्यों बनायीं धरा पर इतनी दौलत की,
हर एक को सिर्फ दौलत ही दिखती है।
और क्यों बसाया सीने में दिल का घराना,
जब इस दुनिया में मोहब्बत भी बिकती है।
सोचा चलेंगे साथ कुछ पल तो साथी बनेगे,
इस रकीबों की दुनिया में दोस्ती नहीं मिलती है।
ख़्वाबों को सच करने का ख्वाब हम है पालें,
हकीकत का जाम पिया तो आँखों से नींद खुलती है।
दरख्तों को काटकर अपना महल तो बनवाया,
पर झरोको से अब ठंडी हवा नहीं गुजरती है।
रहेने दे खुदा, तेरी खुदाई भी हमने देखी है,
इंसान बनाकर मालूम हुआ, तुझमें भी कमी दिखती है।
हर एक को सिर्फ दौलत ही दिखती है।
और क्यों बसाया सीने में दिल का घराना,
जब इस दुनिया में मोहब्बत भी बिकती है।
सोचा चलेंगे साथ कुछ पल तो साथी बनेगे,
इस रकीबों की दुनिया में दोस्ती नहीं मिलती है।
ख़्वाबों को सच करने का ख्वाब हम है पालें,
हकीकत का जाम पिया तो आँखों से नींद खुलती है।
दरख्तों को काटकर अपना महल तो बनवाया,
पर झरोको से अब ठंडी हवा नहीं गुजरती है।
रहेने दे खुदा, तेरी खुदाई भी हमने देखी है,
इंसान बनाकर मालूम हुआ, तुझमें भी कमी दिखती है।
Wednesday, September 1, 2010
यादों की उड़ान
हर पल पलकों से पल गुज़रते रहे, और बनते रहे आंसू मोती।
बादलों में उलझे रहे हम पक्षी, टेड़ी-मेडी उड़ान होती।
न सुध होता उठने का कभी, न सोने का कभी होता समय,
बातों में जो गुजरे वक़्त, संग हमारे रात भी न सोती।
लेटे लेटे रेतों पर हम, देखा किये खुला आसमान,
लहरों ने कभी दी दस्तक, कभी हवाओं ने बदली तान।
चाँद भी निकला किये, चाहे हो अमावस की रात,
तारें भी करे झगडा बड़ा, देखना है जो हमारी शान।
रूठे जो आपस में कभी, तो होले से मना लिया करते थे
रंजिश की कोई गुंजाईश न बचे, इस लिए गले लगा लिया करते थे।
थामे हाथ संग हम चले, हर मस्ती शरारत सब संग किए,
जिस की भी हो गलती चाहे, मिल कर सज़ा खा लिया करते थे।
जब भी बारिश में भीगे हम, तो आसमान ने भी जश्न मनाया है,
हर ख़ुशी हर गम की यादों को दोनों हाथों से दिल में छुपाया है।
दिल के बिछोने पर यारों, यादों की सलवटें को छोड़ा है,
जो नींद न आये रोतों को, तो यादों को ही दुल्हन बनाया है।
चाँद ने भी माँगा होगा कहीं से एक झोला सलोना,
सोचा समेट लूं सारी यादें, पर था उसका झोला छोटा।
ये यादें तो आज़ाद पंछी है, उड़ चला खुले गगन में,
उड़ चलो तुम भी इनके संग, क्यों है मन को तुमने रोका।
बादलों में उलझे रहे हम पक्षी, टेड़ी-मेडी उड़ान होती।
न सुध होता उठने का कभी, न सोने का कभी होता समय,
बातों में जो गुजरे वक़्त, संग हमारे रात भी न सोती।
लेटे लेटे रेतों पर हम, देखा किये खुला आसमान,
लहरों ने कभी दी दस्तक, कभी हवाओं ने बदली तान।
चाँद भी निकला किये, चाहे हो अमावस की रात,
तारें भी करे झगडा बड़ा, देखना है जो हमारी शान।
रूठे जो आपस में कभी, तो होले से मना लिया करते थे
रंजिश की कोई गुंजाईश न बचे, इस लिए गले लगा लिया करते थे।
थामे हाथ संग हम चले, हर मस्ती शरारत सब संग किए,
जिस की भी हो गलती चाहे, मिल कर सज़ा खा लिया करते थे।
जब भी बारिश में भीगे हम, तो आसमान ने भी जश्न मनाया है,
हर ख़ुशी हर गम की यादों को दोनों हाथों से दिल में छुपाया है।
दिल के बिछोने पर यारों, यादों की सलवटें को छोड़ा है,
जो नींद न आये रोतों को, तो यादों को ही दुल्हन बनाया है।
चाँद ने भी माँगा होगा कहीं से एक झोला सलोना,
सोचा समेट लूं सारी यादें, पर था उसका झोला छोटा।
ये यादें तो आज़ाद पंछी है, उड़ चला खुले गगन में,
उड़ चलो तुम भी इनके संग, क्यों है मन को तुमने रोका।
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